बृहस्पतिवार, 18 फरवरी 2010
हां अब मैं लड़ना चाहता हूँ - खालिद ए खान
रात को
किसी भी वक़्त
गहरे सनाटे
के बीच में
कोई कराह उठता है
मुझ में ......
धमनियों को
चीरते हुए
सदियों की धूल
के नीचे !
धर्म ग्रन्थ से
दबा हुवा
सांस लेता है
अब भी...
मुझसे ही करता है
मेरा विरोध !
रह रह कर
चीखता है वह
हां हां
अब मैं जागना चाहता हूँ
हां अब मैं हंसना चाहता हूँ
हां अब मैं जीना चाहता हूँ
हां अब मैं लड़ना चाहता हूँ
शुक्रवार, 29 जनवरी 2010
जनकवि गोरखपांडे को जसम और नयी जमात ने याद किया

समझदारों का गीत - गोरख पांडे
हवा का रूख कैसा है , हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यॊं दे देते हैं , हम समझते हैं
हम समझते हैं खून का मतलब
पैसे की कीमत समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या हे हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं
चुप्पी का मतलब हम समझते हैं
बोलते हैं तॊ सॊच समझकर बॊलते हैं हम
हम बॊलने की आजादी का मतलब समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरॊजगारी अन्याय से तेज दर से बढ़ रही हो
हम आजादी और बेरॊजगारी दॊनॊं के खतरे समझते हैं...
कल 29 जनवरी को जनसंस्कृतिमंच और नयी जमात ने मिलकर जनकवि गोरखपांडे के जन्मदिन पर उनकी रचनाओं का पाठ कर और उनपर चर्चा कर उन्हें याद किया। इस गोष्ठी की अध्यक्षता जेएनयू के अध्यापक और भगतसिंह,पाश और गोरख पांडे से जुडे संदर्भों को लगातार रेखांकित करने वाले श्री चमनलाल ने की। रंजीत वर्मा,कुमार इरेन्द्र,सुधीर सुमन,अजय प्रकाश,भाषा सिंह,शोभा सिंह,अच्युतानंद मिश्र,रूबल,कुमार मुकुल,कमल कुमार,रोहित प्रकाश,विपिन चौधरी,मुकुल सरल आदि ने इसमें शिरकत की।
इससे पहले पिछले शुक्रवार को नयी जमात की ओर से अनिता भारती ने अपनी दो छोटी लघुकथाओं का पाठ किया था। अगली बार नयी जमात की बैठक में विपिन चौधरी अपनी कविताओं का पाठ करेंगी। पुस्तक मेले की वजह से संभवत: यह बैठकी मेले परिसर में आयोजित होगी जिसकी सूचना दे दी जाएगी।
सोमवार, 25 जनवरी 2010
कवियों के कवि शमशेर की जन्मशती

जी को लगती है तेरी बात खरी है शायद
वही शमशेर मुज्फ्फरनगरी है शायद
य' शाम है
कि आसमान खेत है पके हुए अनाज का।
लपक उठीं लहू भरी दरातियां,
-आग है:
13 जनवरी 1911 को देहरादून में कवियों के कवि शमशेर बहादुर सिंह का जन्म हुआ था। इस तरह से यह साल उनकी जन्मशती का है। तो इसी अवसर पर कल कॉफी हाउस कनॉट प्लेस में हम शुक्रवारी बैठक करने वालों ने शमशेर पर बातें कीं और उनकी कविताओं का पाठ किए। इस अवसर पर समयांतर के संपादक और प्रतिष्ठित उपन्यासकार पंकज बिष्ट और वरिष्ठ कवि जीतेन्द्र राठौर ने शमशेर को याद करते कुछ संस्मरण सुनाए। कॉफी हाउस में शमशेर,नागार्जुन,त्रिलोचन आदि भी आते रहते थे। तो एक बार अजय सिंह के साथ शमशेर,त्रिलोचन वहां आए। बैठकी में देर हो रही थी तो अजेय सिंह चिंतित थे कि इन दो बुजुर्गों को कैसे ले जाया जाएगा कि देर होने पर बसें मिलेंगी नहीं। तो वहां राजकुमार सैनी ने कहा कि मैं अपनी गाडी से इन्हें पहुंचा दूंगा,आप चिंता ना करें, ये दोनों तो मेरे बाप हैं...इस पर काफी हंसी हुयी।
धर्मेंन्द्र सुशांत ने पटना के उन दिनों को याद किया जब वहां समन्वय ने एक बार 13 जनवरी की भयानक ठंड में खुले गांधी मैदान में पूरे दिन शमशेर पर बैठकी करवायी थी। पूरे दिन लोग आ आकर शमशेर की कविताओं का पाठ करते रहे। वहां देखा गया कि दुरूह समझी जाने वाली शमशेर की कविताओं में आम लोग भी काफी रूचि ले रहे हैं।
इस बैठकी में अन्य लोगों ने शमशेर की कविताओं का पाठ किया। बैठकी में भाग लेने वालों में जितेन्द्र राठौर,अंजनी कुमार,प्रदीप सौरभ,धर्मेंन्द्र सुशान्त,अच्युतानंद मिश्र,सुधीर सुमन,कुमार मुकुल,मदन कश्यप,रामजीयादव,पंकज बिष्ट,रंजीता आदि ने भाग लिया।
हम निकलने ही वाले थे कि अग्रज कवि कृष्ण कल्पित का संदेश आ गया - आई आई सी एनेक्सी में जब वह प्रसिद्ध बाजीगर हाथ की सफाई दिखा रहा था तब जिस कृषकाय वृद्ध को दरवाजे से खदेड दिया गया , उसे गौर से देखो , वही शमशेर मुजप्फफरनगरी है शायद। वो धीरे-धीरे गालिब की मजार की ओर बढ रहा है।
अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…
यह बैठकी ज़िन्दा रहे!
१५ जनवरी २०१० ९:१० AM
कॉफी हाउस में कविता पाठ
राजेन्द्र शर्मा,आरचेतन क्रांति,राधेश्याम मंगोलपुरी,अंजनी और रमेश प्रजापति
विगत शुक्रवार को कॉफी हाउस में युवा कवि राजेन्द्र शर्मा और रमेश प्रजापति ने अपनी कविताएं पढीं। कविता पाठ में शामिल होनेवालों में रंजीत वर्मा,मिथिलेश श्रीवास्तव,आर चेतन क्रांति,अंजनी कुमार,राधेश्याम मंगोलपुरी,आशोक कुमार पांडेय,कुमार मुकुल आदि थे। आगामी दो शुक्रवारों 25 व 1 जनवरी को हमारा शुक्रवारी पाठ स्थगित रहेगा। इसके बाद वाले शुक्रवार से फिर हमारी गोष्ठियां पहले की तरह होंगी।
आगामी 8 जनवरी को मिथिलेश श्रीवास्तव अपनी कविताएं पढेंगे।
Udan Tashtari ने कहा…
कुछ कवियायें उसमें से पढ़वाते तो हम भी आनन्द उठा लेते.
२१ दिसम्बर २००९ ४:२५ PM
विगत शुक्रवार को कॉफी हाउस में युवा कवि राजेन्द्र शर्मा और रमेश प्रजापति ने अपनी कविताएं पढीं। कविता पाठ में शामिल होनेवालों में रंजीत वर्मा,मिथिलेश श्रीवास्तव,आर चेतन क्रांति,अंजनी कुमार,राधेश्याम मंगोलपुरी,आशोक कुमार पांडेय,कुमार मुकुल आदि थे। आगामी दो शुक्रवारों 25 व 1 जनवरी को हमारा शुक्रवारी पाठ स्थगित रहेगा। इसके बाद वाले शुक्रवार से फिर हमारी गोष्ठियां पहले की तरह होंगी।
आगामी 8 जनवरी को मिथिलेश श्रीवास्तव अपनी कविताएं पढेंगे।
Udan Tashtari ने कहा…
कुछ कवियायें उसमें से पढ़वाते तो हम भी आनन्द उठा लेते.
२१ दिसम्बर २००९ ४:२५ PM
कॉफी हाउस में रंजीत वर्मा का कविता पाठ
कल शुक्रवार को कॉफी हाउस कर्नाट प्लेस में रंजीत वर्मा ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इस पाठ में रामजी यादव,अनिरूद्ध सत्यार्थ,कुमार इरेन्द्र,आर चेतन क्रांति,मदन कश्यप,मिथिलेश श्रीवास्तव,कुमार मुकुल,अंजनी कुमार आदि ने भाग लिया। अगली बार संभवत: कवयित्री विपिन चौधरी अपनी कविताओं का पाठ करेंगी।
अगले शुक्रवार को कॉफी हाउस में रंजीत वर्मा का कविता पाठ
पिछले शुक्रवार को कॉफी हाउस में कथाकार विवेकानंद ने अपनी कहानी का पाठ किया था। कथा में उसका नायक अपनी प्रेमिका की शादी में जाने की उधेडबुन में चला जा रहा है सोचता हुआ आपनी यादों का विश्लेषण करता और किसी और बारात में पहुंच जाता है। यह कहानी बीस साल पहले सारिका में छपी थी। पाठ में रंजीत वर्मा, कुमार मुकुल, अंजनी,कुमार इरेंद्र आदि थे।
अगले शुक्रवार को कवि रंजीत वर्मा अपने नये आये कविता संग्रह एक चुप के साथ से कविताएं पढेंगे।
अगले शुक्रवार को कवि रंजीत वर्मा अपने नये आये कविता संग्रह एक चुप के साथ से कविताएं पढेंगे।
हो रहा होरहा - कुमार वीरेन्द्र का कविता पाठ
कल दिवाली की पूर्वसंध्या पर कनॉट प्लेस कॉफी हाउस में हमेशा की तरह रचना पाठ हुआ। इस बार भोजपुर,आरा के कवि और जनपथ के कार्यकारी संपादक कुमार वीरेन्द्र ने अपनी तीन लंबी कविताएं पढीं। उनकी पहली कविता थी - होरहा। बिहार के ग्रामीण इलाकों में चने की फसल जब पक जाती है तो अंत में शाम में चलते समय खेत में चने के पके और सूखे पौधों को आग में पकाकर समूह में बैठ परिवार के लोग और खेतिहर चना छुडा छुडाकर खाते हैं। होरहा पकाने के इस आनंद को इसमें शामिल लोग ही समझ सकते हैं , यह कविता इसी आनंद को अभिव्यक्त करती ग्रामीण परिवेश की अन्य जटिलताओं को भी सामने रखती है-
हो रहा होरहा
होरहा हो रहा, हो रहा
लाठी-खोरनाठी उपर बूंट-मटर की रख डांठ
तर लहक रही लह-लह आम-महुआ की पतई
बह रही सन-सन,पन-पन पछुआ बयार
उठ रहा धुंआ,घूम रहा,छू रहा समूचे बधार
और झोरा रहा,झोरा रहा लहर लूटते लहर, यह होरहा
झर-झर चू रहे,बूंट-मटर की ढेंढी-छेमी
आहा-आहा कर चहक रहीं,बहक रहीं,महक रहीं
बेटू-छितू मोर बिटिया,मोर हिया,मोर चिरईं
मन मोर मुस्कुरा रहा,भूख भी चमक रही,मुख भी दमक रहा
आग की दवंक में आंख-भर ही सही,दुख भी झुलस रहा,लहक रहा
यह बधार में कैसा आहार रोम-रोम में फरफरा रहा,अखिंया रही निहार
आहा-आहा पापा,पापा ओह-ओह कित्ता अच्छा,अच्छा-अच्छा
चह-चह,करते मह-मह,दौड-दौड ला रहीं,झोंक रहीं पतई
और पापा रे पापा,झोर रहा होरहा रे होरहा
हो रहा हो रहा,ओ हो रहा, हो रहा...........
कल दिवाली की पूर्व संध्या के चलते कॉफी हाउस खाली सा था, इस पाठ में शामिल होने वाले कुछ युवा अजय,रामजी,अच्युता,अंजनी आदि गांव घर को निकले थे या दिवाली पर घर के काम में लग आ नहीं सके थे, पर जैसा सस्वर पाठ कुमार ने किया उसने सबको अचंभे में डाल दिया। यह दिल्ली में कुमार का पहला पाठ था। इससे पहले वरिष्ठ कविता दिनेश कुमार के शुक्ल में भी अजब शमा बंधा था, कि कॉफी हाउस के बेयरे भी पास आ कविताएं सुनने लगे थे। हालांकि पास ही कुछ युवा अपनी व्यावसायिक बैठक में जिस तरह शोर कर रहे थे स्वाभाविक तौर पर उससे दिनेश जी विचलित हो रहे थे बार-बार।
पर इस बार कुछ अलग नजरा था, बेयरे तो इस बार भी कविता सुनने कुछ देर को आ जुटे थे पर पाठ में कुमार का स्वर इस कदर उंचा था कि पास की एक मंडली को उठकर दूर जाना पडा। यह असहज था पर इस सब का कुछ हल निकाला जाएगा आगे। कि एक दूसरे को परेशानी ना हो और सुनना चाहने वालों को भी सहजता का बोध हो।
कविता के बीच में जब एक जगह हो हो... की ध्वनि की कुमार ने, तो मैं तो घबरा ही गया। बाद में पता चला कि कुमार पाठ के बीच में जहां चैता की पंक्तियां हो वहां बकायदा झाल लेकर उंचे स्वर में चैता का पाठ करते हैं। यह कविता पाठ की नागार्जुन आदि की बिसरा दी गयी परंपरा का विकास है जो दूर भोजपुर के एक खेतिहर कवि के यहां होता दिख रहा है।
पाठ में शामिल सुधीर सुमन,डॉ विवेकानंद,प्रेम भारदवाज,इरेंद्र , कुमार मुकुल आदि का भी ख्याल था कि कुमार उस परंपरा को विलक्षण ढंग से ज्यादा ताकतवर ढंग से वापिस ला पा रहे हैं। कुमार वीरेन्द्र का दूसरा कविता संग्रह अब तैयार है, दलिदर यानि दरिद्र शीर्षक से संभवतया यह किताब आये। दलिदर कविता में कवि लिखता है-
मां
घर-घर घुस
पीट-पीट सूप
आगे-आगे
भगा रही दलिदर
और दलिदर
मां के पीछे-पीछे
चल रहा छिपे-छिपे
संगीता पुरी ने कहा…
पल पल सुनहरे फूल खिले , कभी न हो कांटों का सामना !
जिंदगी आपकी खुशियों से भरी रहे , दीपावली पर हमारी यही शुभकामना !!
१६ अक्तूबर २००९ १०:५६ PM
ललित शर्मा ने कहा…
निशि दिन खिलता रहे आपका परिवार
चंहु दिशि फ़ैले आंगन मे सदा उजियार
खील पताशे मिठाई और धुम धड़ाके से
हिल-मिल मनाएं दीवाली का त्यौहार
१६ अक्तूबर २००९ १०:५८ PM
अरविन्द श्रीवास्तव ने कहा…
कुमार वीरेन्द्र की जन कविता...बधाई...दीपावली की शुभकामनाएं
१७ अक्तूबर २००९ १२:१८ AM
हो रहा होरहा
होरहा हो रहा, हो रहा
लाठी-खोरनाठी उपर बूंट-मटर की रख डांठ
तर लहक रही लह-लह आम-महुआ की पतई
बह रही सन-सन,पन-पन पछुआ बयार
उठ रहा धुंआ,घूम रहा,छू रहा समूचे बधार
और झोरा रहा,झोरा रहा लहर लूटते लहर, यह होरहा
झर-झर चू रहे,बूंट-मटर की ढेंढी-छेमी
आहा-आहा कर चहक रहीं,बहक रहीं,महक रहीं
बेटू-छितू मोर बिटिया,मोर हिया,मोर चिरईं
मन मोर मुस्कुरा रहा,भूख भी चमक रही,मुख भी दमक रहा
आग की दवंक में आंख-भर ही सही,दुख भी झुलस रहा,लहक रहा
यह बधार में कैसा आहार रोम-रोम में फरफरा रहा,अखिंया रही निहार
आहा-आहा पापा,पापा ओह-ओह कित्ता अच्छा,अच्छा-अच्छा
चह-चह,करते मह-मह,दौड-दौड ला रहीं,झोंक रहीं पतई
और पापा रे पापा,झोर रहा होरहा रे होरहा
हो रहा हो रहा,ओ हो रहा, हो रहा...........
कल दिवाली की पूर्व संध्या के चलते कॉफी हाउस खाली सा था, इस पाठ में शामिल होने वाले कुछ युवा अजय,रामजी,अच्युता,अंजनी आदि गांव घर को निकले थे या दिवाली पर घर के काम में लग आ नहीं सके थे, पर जैसा सस्वर पाठ कुमार ने किया उसने सबको अचंभे में डाल दिया। यह दिल्ली में कुमार का पहला पाठ था। इससे पहले वरिष्ठ कविता दिनेश कुमार के शुक्ल में भी अजब शमा बंधा था, कि कॉफी हाउस के बेयरे भी पास आ कविताएं सुनने लगे थे। हालांकि पास ही कुछ युवा अपनी व्यावसायिक बैठक में जिस तरह शोर कर रहे थे स्वाभाविक तौर पर उससे दिनेश जी विचलित हो रहे थे बार-बार।
पर इस बार कुछ अलग नजरा था, बेयरे तो इस बार भी कविता सुनने कुछ देर को आ जुटे थे पर पाठ में कुमार का स्वर इस कदर उंचा था कि पास की एक मंडली को उठकर दूर जाना पडा। यह असहज था पर इस सब का कुछ हल निकाला जाएगा आगे। कि एक दूसरे को परेशानी ना हो और सुनना चाहने वालों को भी सहजता का बोध हो।
कविता के बीच में जब एक जगह हो हो... की ध्वनि की कुमार ने, तो मैं तो घबरा ही गया। बाद में पता चला कि कुमार पाठ के बीच में जहां चैता की पंक्तियां हो वहां बकायदा झाल लेकर उंचे स्वर में चैता का पाठ करते हैं। यह कविता पाठ की नागार्जुन आदि की बिसरा दी गयी परंपरा का विकास है जो दूर भोजपुर के एक खेतिहर कवि के यहां होता दिख रहा है।
पाठ में शामिल सुधीर सुमन,डॉ विवेकानंद,प्रेम भारदवाज,इरेंद्र , कुमार मुकुल आदि का भी ख्याल था कि कुमार उस परंपरा को विलक्षण ढंग से ज्यादा ताकतवर ढंग से वापिस ला पा रहे हैं। कुमार वीरेन्द्र का दूसरा कविता संग्रह अब तैयार है, दलिदर यानि दरिद्र शीर्षक से संभवतया यह किताब आये। दलिदर कविता में कवि लिखता है-
मां
घर-घर घुस
पीट-पीट सूप
आगे-आगे
भगा रही दलिदर
और दलिदर
मां के पीछे-पीछे
चल रहा छिपे-छिपे
संगीता पुरी ने कहा…
पल पल सुनहरे फूल खिले , कभी न हो कांटों का सामना !
जिंदगी आपकी खुशियों से भरी रहे , दीपावली पर हमारी यही शुभकामना !!
१६ अक्तूबर २००९ १०:५६ PM
ललित शर्मा ने कहा…
निशि दिन खिलता रहे आपका परिवार
चंहु दिशि फ़ैले आंगन मे सदा उजियार
खील पताशे मिठाई और धुम धड़ाके से
हिल-मिल मनाएं दीवाली का त्यौहार
१६ अक्तूबर २००९ १०:५८ PM
अरविन्द श्रीवास्तव ने कहा…
कुमार वीरेन्द्र की जन कविता...बधाई...दीपावली की शुभकामनाएं
१७ अक्तूबर २००९ १२:१८ AM
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